उत्तर प्रदेशबस्ती

पशु चिकित्सालयों में व्याप्त संकट: प्रशासनिक लापरवाही से दांव पर लगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

'बनकटी' का पशु 'चिकित्सालय' ही 'बीमार' चल 'रहा' : प्रशासनिक अव्यवस्था पर उठे सवाल पशु चिकित्सालयों में संकट: स्टाफ की कमी और बढ़ती बीमारियों से किसान परेशान

अजीत मिश्रा (खोजी)

‘अन्नदाता’ की रीढ़ पर प्रहार: खुद बीमार ‘बनकटी’ का पशु चिकित्सालय!

  • मुंडेरवा-बनकटी में पशु चिकित्सा व्यवस्था ठप होने की कगार पर, पशुपालकों में भारी आक्रोश
  • पशुपालन की रीढ़ पर प्रहार: डॉक्टरों और स्टाफ के अभाव में जूझ रहे हैं सरकारी चिकित्सालय
  • प्रशासनिक अनदेखी या लापरवाही? बदहाली की मार झेल रहे बनकटी के पशु चिकित्सालय

बस्ती। यह विडंबना ही है कि जो चिकित्सालय मूक पशुओं को नया जीवन देने के लिए बने थे, वे आज खुद प्रशासनिक कुप्रबंधन और स्टाफ की कमी की ‘बीमारी’ से जूझ रहे हैं। बनकटी और मुंडेरवा क्षेत्र के राजकीय पशु चिकित्सालयों की बदहाली ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।मुंडेरवा और बनकटी क्षेत्र के राजकीय पशु चिकित्सालय इन दिनों गंभीर प्रशासनिक और व्यावहारिक संकट से जूझ रहे हैं। एक तरफ जहां क्षेत्र के पशुओं में बीमारियां तेजी से फैल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ स्टाफ की कमी और हालिया प्रशासनिक बदलावों ने इन चिकित्सालयों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

संकट गहरा, अधिकारी मौन?

डॉ. रविंद्र कुमार यादव के कार्यकाल में जिन चिकित्सालयों की व्यवस्था सुचारू और सुदृढ़ थी, आज वहां छाई अनिश्चितता ने पशुपालकों की नींद उड़ा दी है। मुंडेरवा चिकित्सालय में अनुचर के सेवानिवृत्त होने के बाद से तो हालत और भी बदतर हो गई है। डर इस बात का है कि कहीं इन चिकित्सालयों में ताले न लटक जाएं।जानकारी के अनुसार, वर्षों से मुंडेरवा और बनकटी दोनों पशु चिकित्सालयों की जिम्मेदारी पशु चिकित्साधिकारी डॉ. रविंद्र कुमार यादव संभाल रहे थे। उनके कार्यकाल में व्यवस्था सुचारू और सुदृढ़ थी, और पशु सेवाएं व आपातकालीन सहयोग बेहतर ढंग से संचालित हो रहे थे।

हालांकि, उनके स्थानांतरण के बाद सेवाओं के प्रभावित होने का डर बना हुआ है। वहीं, 30 जून को मुंडेरवा पशु चिकित्सालय के अनुचर (अटेंडेंट) के सेवानिवृत्त होने के बाद अस्पताल के संचालन में अनिश्चितता और भी गहरी हो गई है। स्थानीय लोगों के मन में अब यह आशंका घर कर गई है कि कहीं आने वाले समय में मुंडेरवा राजकीय पशु चिकित्सालय में ताले न लग जाएं।

पशुपालकों की चिंता और भविष्य पर खतरा

क्षेत्र में फैली विभिन्न बीमारियों के कारण पशुपालक बेहद चिंतित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि:

  • पशुओं में तेजी से फैल रही बीमारियां उनके दूध उत्पादन और कुल पशुधन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं।
  • पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसकी अनदेखी करने से गंभीर परिणाम निकल सकते हैं।

यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो किसान आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।क्षेत्र में पशुओं में फैल रही बीमारियां दूध उत्पादन और पशुधन पर सीधा प्रहार कर रही हैं, लेकिन प्रशासन की सक्रियता अभी भी कागजों तक ही सीमित है। ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि:

  • ​जब तक नए पशु चिकित्साधिकारी और आवश्यक स्टाफ की तैनाती न हो, पुरानी व्यवस्था को ही यथावत रखा जाए।
  • ​बढ़ती बीमारियों को देखते हुए तत्काल विशेष पशु चिकित्सा शिविर लगाए जाएं।
  • ​दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित हो और ग्रामीण स्तर पर निगरानी तंत्र सक्रिय किया जाए।

प्रशासन से मुख्य मांगें

ग्रामीणों ने प्रशासन से इस स्थिति में तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  • जब तक नए पशु चिकित्साधिकारी और आवश्यक स्टाफ की तैनाती नहीं हो जाती, तब तक वर्तमान व्यवस्था को यथावत रखा जाए ताकि इलाज में कोई बाधा न आए।
  • बढ़ती बीमारियों को देखते हुए तत्काल विशेष पशु चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाएं।
  • दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और ग्रामीण स्तर पर निगरानी व्यवस्था को सक्रिय किया जाए।

आंदोलन की चेतावनी

पशुपालकों का स्पष्ट कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे सड़क पर उतरने को मजबूर होंगे। क्या प्रशासन किसी बड़े नुकसान का इंतज़ार कर रहा है, या फिर ‘पशुपालन’ के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाकर किसानों को राहत प्रदान करेगा? यह सवाल अब जवाब मांग रहा है।

अब गेंद जिम्मेदारी विभाग के पाले में है कि वह इस व्यवस्था को स्थिर बनाए रखे और किसानों को समय पर राहत प्रदान करे।

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